सीवान के शहरी तथा ग्रामीण महिलाओं के गृहव्यवस्थापन का तुलनात्मक अध्ययन
सपना कुमारी1, अरुणा कुमारी2
1षोध-अध्येत्ता गृहविज्ञान विभाग जय प्रकाष विष्वविद्यालय छपरा
2सहायक आर्चाय गृहविज्ञान विभाग लोक महाविद्यालय, हाफिजपुर छपरा
*Corresponding Author E-mail:
शोध सारांष
हमारे जीवन को सँवारने में प्रबन्ध की भूमिका महत्वपूर्ण है। आज के बदलते परिवेष में परिवत्र्तनो से उत्पन्न समस्याओं के पहचान तथा निदान हेतु प्रबन्ध आवष्यक है। गृहव्यवस्था में भी समय के साथ परिवत्र्तनों द्वारा आधुनिक गृह अधिक आरामदायक, सुविधापूर्ण एवं अनेक संतोषप्रद आवास में बदल गया है। एक अच्छे घर में अनुकूल वातावरण होन से घर के सदस्यों की आवष्यकताओं के साथ भौतिक, भावनात्मक तथा सामाजिक जरुरतो की संतोषप्रद व्यवस्था संपन्न हुई है। यह अध्ययन सीवान जिला के शहरी तथा ग्रामीण महिलाओं के भिन्न परिवेष में गृहव्यवस्था का तुलनात्मक अध्ययन है। इसमें 100 महिलाओं का प्रतिदर्ष लेकर गृहव्यवस्था स्केल (हसीन ताज तथा हेमलता, 2001) के उपयोग द्वारा व्यक्तिगत सूचनाओं तथा गृहव्यवस्थापन तरीको का उपादान समाहित किया गया है।
'kCndqath: शहरी तथा ग्रामीण महिलाओं के गृहव्यवस्थापन.
परिचय
गृह एक अनौपचारिक माध्यम है जो विकासषाील मानव मूल्यों को ठोस ढ़ाचा है। यह सदस्यों के भौतिक भावनात्मक तथा मानसिक जरुरतों की पूर्ति के साथ जीवन के मूल्यों का निर्वहन करके बच्चो के वृद्धि हेतु अनुकूल वातावरण तथा सदस्यों के लरवन का संखलन तथा परिमार्जन (सक्सेना, 2009) करता है।
गृहव्यवस्था शब्द मारिया पार्लोवा (1880) ने व्यक्त किया। इस पद का प्रथम उपयोग गृह आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सभी आवश्यक तथ्यों के लिए किया जाता है। गृहव्यवस्था शब्द का उपयोग अब वास्तविक रुप में किए जानेवाले सभी गृहकार्यो से पूर्ण समंजित गृह के रुप में हो रहा है। गृहव्यवस्था विभिन्न प्रबन्धकीय अवस्थाओं पर निर्भर करता है। किसी घर में पारिवारिक लक्ष्यों की पूर्णता हेतु उपलब्ध संसाधनों की पहचान तथा उपयुक्त उपयोग द्वारा प्रभावी प्रबन्धकीय क्रियाओं का संपादन संपन्न होता है। आज बदलते हुए परिवेश में समस्याओं की पहचान तथा निदान हेतु भी कार्यशैली में बदलाव के साथ प्रबन्ध की आवश्यकता (नारायणन, 2006) प्रासंगिक हुई हैं। एक गृहिणी अपने प्रबन्धकीय योग्यताओं तथ नेतृत्व गुणों के प्रयोग से पारिवारिक सदस्यों को प्रेरित या इच्छित उद्देष्यों की पूर्ति कर सकती है। गृहव्यवस्था विभिन्न प्रबन्धकीय क्रियाओं से प्रभावित होता है। इसमें निर्णय की क्षमता किये जानेवाले कार्य की प्रकृति के अनुसार क्रियाओं को समझने तथा उपयुक्त विधियों का सफल उपयोग (ठाकुर तथा सुल्तानिया, 2010) शामिल किया जाता है।
आज तकनिकी तथा औधोगिक विकास द्वारा जीवन तो हुआ है, लेकिन महिलाओं के योगदान में भी काफी परिवर्तन हुए है। अब परिवार में सामाजिक परिवत्र्तनों के कारण परिवेश में बदलाव ही नहीं बल्कि पारिवारिक सदस्यों की भूमिका भी प्रगतिशील हुई है। इससें गृहकार्यो में गतिशील भूमिका, बच्चो के विकास की जवाबदेही तथा गृहव्यवस्था को बदलने में महिलाओं की अग्रणी ईच्छा का विकास हुआ है। कामकाजी महिलाओं में कार्य-जीवन संतुलन के प्रति सोच का विकास हुआ है। कामकाजी महिलाओं में कार्य-जीवन संतुलन के प्रति जागरुकता तथा गृहकार्यो का सरलीकरण कठिन है। भारत जैसे विकासशील देशों में विवादित भूमिका, स्वास्थ्य का स्तर, समय व्यवस्थापन की समस्या तथा उपयुक्त सामाजिक सहयोग की कमी नौकरीपेशा महिलाओं में (मणि, 2013 तथा सुतारिया, 2010) उभरकर सामने आयी है।
हाल में शैक्षणिक सुविधाओं की वृ़िद्ध तथा बहुआयामी परिवत्र्तनों से नौकरीपेशा महिलाओं की संख्या बढ़ी है। यह जनसंख्या वृद्धि, आर्थिक बोझ तथा खत्म हो रहे प्राकृतिक संसाधनों से प्रभावित हुआ है। अतः गृहव्यवस्था अब केवल गृहसंचालन नही होकर गृहव्यवस्थापन के प्रति एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण (कालिया, 2005 तथाजेनी, 2013) के रुप में उभरा है।
यह अध्ययन शहरी तथा ग्रामीण महिलाओं के उम्र, शिक्षा, परिवार के आकार तथा पारिवारिक आय के आधार पर गृहव्यवस्थापन का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। इस अध्ययन का विषेष उद्देश्य शहरी तथा ग्रामीण महिलाओं के गृहव्यवस्थापन क्रियाओं तथा इनके सामाजिक-आर्थिक प्रतिमानो का मूल्यांकन है।
शोधविधि
इस शोध पत्र का उद्देश्य सीवान जिला के शहरी तथा ग्रामीण महिलाओं के गृहव्यवस्था क्रियाओं का तुल्नात्मक अध्ययन है। इस अध्ययन में प्रतिदर्श हेतु यादृच्छिक रुप से 50 शहरी तथा 50 ग्रामीण महिलाओं को चयनित किया गया है। इन प्रतिभागियों का उम्र 25 से 55 वर्ष के मध्य रखा गया है।
सारणी 1ः व्यक्तिगत सूचना के आधार पर उत्तरदाताओं का वित्तरण
आँकड़ो के संग्रह हेतु विवेचनात्मक तथा विवरणात्मक शोध प्रारुप का प्रयोग किया गया है। गृहव्यवस्था स्केल का उपयोग शहरी तथा ग्रामीण महिलाओं से प्राप्त आँकड़ो के विष्लेषण हेतु प्रस्तावित है। हसीन ताज तथा हेमलता (2001) के बृहद् प्रबन्ध स्केल में महिलाओं के सामान्य धारणा तथा गृहप्रबन्ध के पाँच क्षेत्रों से सम्बद्ध 102 प्रश्न है। इन प्रश्नों को पाँच क्षेत्रों यथा पारिवारिक सदस्यों से तालमेंल, भोजन-प्रबन्ध, वस्त्र-प्रबंध, गृह-सज्जा प्रबंध तथा समय प्रबन्ध में वर्गीकृत किया गया है।
परिणाम तथा विवेचना
सारणी-1 में विभिन्न श्रेणी के अन्त्तर्गत आनेवाली महिलाओं का जनसंख्यिकीय आँकड़ों का प्रदर्शन है। इन महिलाओं का उम्रसमूह, शैक्षणिक योग्यता परिवार की प्रकृति, सदस्यों की संख्या तथा पारिवारिक मासिक आय भिन्न है।
सारणी 02 में विभिन्न गृहव्यवस्थापन क्रियाओं के आधार पर उतरदाताओं का वितरण दिखाया गया है। गृहव्यवस्था के पाँच क्षेत्रो के प्रति गृहव्यवस्था क्रियाओं का वितरण सभी उत्तरदायित्त्व की भावना प्रदर्शित करते हैं। अतः उत्तरदाताओं को औसत तथा अच्छा जैसे केवल दो समूहों में श्रेणीकरण किया गया।
गृहव्यवस्था के प्रथम श्रेणी यानि पारिवारिक सदस्यों से उत्तरदाताओं का तालमेल प्रदर्शित करता हैं कि 70ः महिलाएँ अच्छा तालमेंज वाली थी जिनमें 31ः शहरी तथा 40ः ग्रामीण क्षेत्रों से थी। बाकी 30ः औसत श्रेणी में रखी गयी जो शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा भिन्नता नहीं प्रदर्शित करपाई थी। यहाँ ग्रामीण महिलाओं की अपेक्षा कम तनाव के साथ गृहकार्य में ज्यादा समय लगने के कारण प्रदर्शित (संडाल, 2006, मणि, 2013, जैन, 2005, नसरुद्दीन, 2008 तथा विजय, 2012) हुआ है।
सारणी 2ः विभिन्न गृहकार्य क्रियाओं में संलग्नता के आधार पर उत्तरदाताओं का वितरण
आहार प्रबन्धन के क्षेत्र में 90.9ः महिलाओं की अच्छी जानकारी थी जिनमें 46ः शहरी तथा 41ः ग्रामीण क्षेत्रों से थी। इस अध्ययन के बाकी 20ः महिलाओं का आहार-प्रबन्धन में औसत भागीदारी प्रदर्शित हुई जिनमें 9ः शहरी तथा 11ः ग्रामीण महिलाएँ थी। यहाँ ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरी महिलाओं की अधिक भागीदारी संचार माध्यमों तथा गृहपुस्तको के अध्ययन के कारण रहा होगा। इनके पास भोजन क्रियाओं, भोज्य-सामग्री खरीदने में निर्णायक क्षमता, पोषण, दैनिक पोषक आवश्यकताओं, भोज्य प्रबंध, भोजन मूल्यों तथा भोज्य-सामग्री का अच्छा ज्ञान (पार्वती, 2013 खंडाइ, 2006, रावल, 2009 तथा त्रिवेदी, 2010) प्रदर्शित हुआ।
इस अध्ययन में वस्त्र-प्रबंधन में स्वतंत्र निर्णयों के कारण ग्रामीण महिलाओं में 43ः जबकि शहरी महिलाओं में 32ः कुशल प्रदर्शन देखी गयी। वस्त्र-प्रबंधन में बाकी 23ः महिलाओं का औसत मिला जिनमें 17ः शहरी तथा 6ः ग्रामीण क्षेत्रों से थी।
यहाँ सारणी-2 के अनुसार, गृहसज्जा में 92ः कुशल महिलाओं में 45ः ग्रामीण तथा 47ः शहरी क्षेत्रों में निवास करती थी। औसत प्रदर्शनवाली बाकी 7ः महिलाओं में 3ः शहरी तथा 4ः ग्रामीण महिलाएँ रही।
यहाँ समय तथा शारीरिक क्षमता के निर्वहनमें 88ः कुशल में 34ः ग्रामीण तथा 48ः शहरी महिलाओं का कुशल भागीदारी प्रदर्शित हुआ। ये महिलाएँ अपने समय तथा उर्जा का उपयोग बत्र्तन धोने, भोजन बनाने तथा गृहसज्जा में कार्य सरलीकरण विधियों के अपयोग से परिचित थी (सईद, 2014) तथा उनमें विभिन्न उपागमों बदलते परिदृश्य, योजना तथा समय तथा प्रयास घटाने की कम हो रही जिम्मेवारियों में पहुँच तथा ज्ञान (खंडाई, 2006) प्रदर्शित हुआ है।
निष्कर्षः
यहाँ गृहमालकिन की प्रबन्धकीय योग्यता, अभिरुचि, नेतृत्व क्षमता तथा अन्य सदस्यों की उत्प्रेरण क्षमता ऐसे निष्कर्षात्मक तथ्य हैं जो पारिवारिक संसाधनों को बेहत्तर उपयोगी बनाता है। अतः गृहप्रबन्ध एक आसान कार्य नही बल्कि सीमित समय मेंगृहप्रबंध की समस्याएँ अनेक शहरी तथा ग्रामीण महिलाओं में प्रदर्शित होती है। परिवार के अन्य सदस्यों को गृहमालकिन के भूमिका को महत्व देते हुए सहयोग की भावना रखनी चाहिए। कार्य समय को लोचदार तथा कार्य सरलीकरण को घर में उपयोग के साथ कार्य एवं पारिवारिक जीवन में संतुलन के लिये शिक्षित तथा समझदार होना जरुरी है।
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Received on 08.02.2021 Modified on 24.02.2021
Accepted on 11.03.2021 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2021; 9(1): 09-12.